Saturday, 6 June 2020

कोई ख़ुशबू घर से चली ही जैसे


कोई  ख़ुशबू  है  के  घर से  वो  चली हो जैसे।
पहली  बारिश  की  शुरूआत  हुयी  हो  जैसे।
 
फिर दिल-ए-ख़ुश-फ़हमे को है उमीदें उनकी
उनके  दिल तक  मेरी  आवाज़ गयी हो जैसे।
 
हो  भटकती   हुई  राहों  में   मुसाफ़िर  तन्हा
उसको मंज़िल से सदा ख़ुद हि मिली हो जैसे।
 
तन्हा  रातों  में  उन्हें  याद  किया  हो   हमने
तब   ख़बर   टूटते   तारे  ने   कही  हो  जैसे।
 
ढूँढते फिरते हों परियों की सि महफ़िल में हम
दफ़’अतन उनकी नज़र मुझसे मिली हो जैसे। 
 
जिंदगी भर का सफ़र इक है तसव्वुर जिसका
वो  ख़ुशी आ के  हक़ीक़त में  मिली  हो जैसे।
 
ख़ुशगवारी  का  ये  एहसास  है  दिल  में  मेरे
उनकी  ‘बेताब’  ग़ज़ल  कोई  हुयी  हो  जैसे।

Thursday, 7 May 2020

लिखूं, पर किसके लिए

मेरे अकेलेपन पर उन्होंने मुझे सलाह दी, 
की बर्खुरदार कुछ लिखा विखा करो,
पूरी रात लग गई समझाने में कि "किसके लिए"..

डर था कहीं डूब ना जाए कश्ती मेरी,
मै "सागर" गहरा समझ रहा था, पर तेरी खामोशी ज्यादा गहरी निकली...

वैसे तो सिर्फ दूरी ही थी हमारे दरम्यान, 
अब एहसास दिलाकर वो भी छीन लिया मुझसे...

मोहब्बत नहीं थी तुमसे, इश्क़ नहीं था तुमसे,
पर जो भी था उसके लिए अल्फ़ाज़ नहीं ह मेरे पास...

एक वक़्त वो भी था, जब तेरे एक एक कसिदे  को, अपनी तनख्वाह समझ लेते थे ....