Monday, 15 July 2019

काश।।

काश की लम्हे भर के लिये रुक जाये ज़मीं की गर्दिशें,
और कोई आवाज़ ना हो तेरी धड़कनों के सिवा...

मेरी तन्हाई का रंग भी बदल सा गया है तेरे इंतज़ार में,
डर है, तुम न बदल जाओ...

सुन रहा था तेरे होंठों से निकले अल्फाजों को,
की मेरे होंठ, मेरी आँखें मझसे ही झगड़ने लगी।

लोग लड़ते हैं मिलने की खातिर ...अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी

लोग लड़ते हैं मिलने की खातिर,
अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी...
तुम पंछी थे,और मैं थी मछली, हम दोनों की अलग  थी दुनिया, अलग जहां ओर अलग जुबां,
सब कहते थे,
हम दोनों का इस दुनिया में मेल कहां...
पर भूल नहीं पाऊंगी वह लम्हा,
जब तुमने दिल की धड़कन सुनाई थी...
लोग लड़ते हैं मिलने की खातिर, अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी...
ये बिछड़ना मिलना ही तो शायद मोहब्बत है,
अपने प्यार को वो दे देना जिसकी उसे जरूरत है...
हम दोनों थे कैद कहीं,
अपनी समझ की सलाखों में... तुमने ऐसा रिहा किया ,
खुद आजादी भी शरमाई थी...

लोग लड़ते हैं मिलने की खातिर, अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी...

अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी

मिलेंगे हम यह वादा है,
रोज रात को चांद के जरिए...
मैं भेजूंगी पैगाम तुम्हें,
इस बहती हुई हवा के जरिए ...

साथ रहेंगे सोच में दोनों , नाजुक नाजुक यादों में...
मैं कहूंगी .. मुझको,  एक मिला था पागल
जिसने जिंदगी सिखाई थी...
तुम कहना सबसे,
एक ज़िद्दी पड़ोसन घर मेरे आई थी...
चलो बहुत हुआ, अब चुप रहूंगी, चुप्पी में मजलूम बहुत है...
तुम जैसा बनना, कहूंगी सबको बस इतना ही मेरा वादा है....
इससे ज्यादा कहूंगी कुछ तो फूट पड़ेगी रुलाई भी....
लोग लड़ते हैं मिलने की खातिर,
अपनी तो बिछड़ जाने की लड़ाई थी....