Wednesday, 19 July 2023

फिर क्यों ढूंढता फिरता हूं तुझे दूसरों में मैं

सुनो....
सच तो ये है कि तेरे होने से था मैं,
और मेरे होने से तूँ.....

फिर क्यों ढूंढता फिरता हूँ
तुझे दूसरों में.....

तूँ तब भी थी और अब भी है
पर तब तेरे होने का एहसास न था
गम तब भी थे और अब भी हैं
पर अब गम भी कुछ सालने से लगे हैं

तूँ कभी खुशियाँ, कभी गम
कभी झूठ तो कभी सच,
कभी हकीक़त तो कभी कहानी
कभी होंठों की मुस्कान तो कभी आंखों का पानी....

तेरे होने से गुलजार सा था मैं
कुछ खुशनुमा इंतज़ार सा था मैं
तूँ ही सफर तूँ ही हमसफ़र ....

ये जिंदगी
अब तूँ ही बता .....वो गया किधर।।

Saturday, 8 July 2023

तुम्हारी हुकूमत के लिए, अपनी हकीकत छोड़ आए।

तुम्हें क्या बताएं हम तुम्हारे लिए क्या-क्या छोड़ आए हैं 
दहलीज पर रखते ही कदम तुम्हारी 
अपना बचपन वहीं छोड़ आए हैं 
तहजीब,सलीका,संस्कार तो सब साथ ले आए पर अपनी बेबाक अल्हड़ सी हंसी वहीं छोड़ आए हैं 
विदाई के समय मां ने झोली भर भर की दी थी दुआएं वो तो साथ ले आए 
पर बस अपनी मां का हाथ वही छोड़ आए हैं 
शहर नया सा रिवायतें अलग सी लगती है यहां और इन गलियों से जब गुजरते हैं तो घुंघट साथ चलता है हमारे 
वो हवा में मदमस्त उड़ता दुपट्टा वहीं छोड़ आए हैं 
अब कस कर बनती है चोटी हमारी 
वो खुली जुल्फों की कई अफसाने वहीं छोड़ आए हैं 
बहुरिया नाम में दम तो बहुत है पर बिटिया शब्द की कसक वहीं छोड़ आए हैं 
ताल्लुक नहीं रखते ज्यादा दोस्तों से अब 
पर बहुत याद आती है वह चौपाटी की चाट जहां पानी पुरी के साथ ना जाने कितने किस्से अधूरे छोड़ आए हैं 
छोटी सी सल्तनत थी हमारी जहां सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक की मर्जी हमारी चला करती थी 
एक तेरी गुलामत के लिए हम अपनी हुकूमत वहीं छोड़ आए हैं 
शादी में पापा ने दी थी रामायण कहा इसमें सीता है वो तो साथ ले आए 
पर दादी की सुनी हजारों कहानियां वह छोड़ आए हैं 
लहजे में अपने सलीके बेशुमार ले आए 
पर जो लगती थी बेहद अपनी सी भाई बहनों के संग वो तू तड़ाक की जबान वहीं छोड़ आए हैं 
अक्सर गहरी लग जाती है नींद रातों को हमारी जिम्मेदारियों को ओढ़ के बेपरवाही के रतजगे वहीं छोड़ आए हैं 
और बहुत खूबसूरत है यह घर अपना पर इस दुनिया के लिए हमें एक पूरा जहान छोड़ आए हैं...

#NJ 

Monday, 22 May 2023

RAHGIR

तुम मुड़ तो पाओगे, पर लौट ना पाओगे
तुम मुड़ तो पाओगे, पर लौट ना पाओगे

मेरी याद आएगी उस मक़ाम पे कभी
तुम पकड़ के गाड़ी शायद मेरे गाँव आओगे
तुम पकड़ के गाड़ी शायद मेरे गाँव आओगे
मैं मिलूँगा ही नहीं उस मकान पे कभी
तुम पकड़ के गाड़ी शायद...

Surat station के बाहर ठंडी bench थी, चाय गरम थी
बगल में एक ताऊ के हाथ में बीड़ी थी जो लगभग ख़तम थी
मैंने बस दो-चार चुस्कियाँ ली थी कि उतने में ताऊ ने दूसरी सुलगा ली थी
पहली को फ़ेंका ज़मीन पर और जूती से कुचल दिया
मुझे जाने क्यूँ तेरी याद आई, मैं उठा और चल दिया

शामों का काम तो ढलना है, ढलेंगी तब भी
हवाओं का काम तो चलना है, चलेंगी तब भी
ज़ुल्फ़ों की तो ये फ़ितरत है, उड़ेंगी तब भी
कोई और सँवारेगा तो भी मेरी याद आएगी

तुम सोच तो लोगे, पर बोल ना पाओगे
तुम सोच तो लोगे, पर बोल ना पाओगे
दिल की बात आएगी ना जबान पे कभी
तुम पकड़ के गाड़ी शायद मेरे गाँव आओगे
मैं मिलूँगा ही नहीं उस मकान पे कभी

Jaisalmer में झाड़ के मिट्टी अपने जूतों-कपड़ों से
एक टीले पर मैं बैठा था, दूर जहाँ के लफ़ड़ों से
दूर कहीं वो ढलता सूरज मुझे छोड़ के तन्हा ढल गया
उस ठंडी रात में, उस ठंडी रेत पर मैं लेटे-लेटे जल गया

शब्द हैं, दर्द है, कलाकारी है, गीत बना लूँगा
उन गीतों की क़ीमत भारी है, मैं कमा लूँगा
ओ, तेरा नाम ना लूँगा, ख़ुद्दारी है, मैं छुपा लूँगा
कोई गुनगुनाएगा तो तुम समझ ही जाओगे

तुम पैसे-औहदों पर इतरा ना पाओगे
तुम पैसे-औहदों पर इतरा ना पाओगे
इतनी तालियाँ होंगी मेरे नाम पे कभी
तुम पकड़ के गाड़ी शायद मेरे गाँव आओगे
मैं मिलूँगा ही नहीं उस मकान पे कभी