सुनो....
सच तो ये है कि तेरे होने से था मैं,
और मेरे होने से तूँ.....
फिर क्यों ढूंढता फिरता हूँ
तुझे दूसरों में.....
तूँ तब भी थी और अब भी है
पर तब तेरे होने का एहसास न था
गम तब भी थे और अब भी हैं
पर अब गम भी कुछ सालने से लगे हैं
तूँ कभी खुशियाँ, कभी गम
कभी झूठ तो कभी सच,
कभी हकीक़त तो कभी कहानी
कभी होंठों की मुस्कान तो कभी आंखों का पानी....
तेरे होने से गुलजार सा था मैं
कुछ खुशनुमा इंतज़ार सा था मैं
तूँ ही सफर तूँ ही हमसफ़र ....
ये जिंदगी
अब तूँ ही बता .....वो गया किधर।।
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