मेरे अकेलेपन पर उन्होंने मुझे सलाह दी,
की बर्खुरदार कुछ लिखा विखा करो,
पूरी रात लग गई समझाने में कि "किसके लिए"..
डर था कहीं डूब ना जाए कश्ती मेरी,
मै "सागर" गहरा समझ रहा था, पर तेरी खामोशी ज्यादा गहरी निकली...
वैसे तो सिर्फ दूरी ही थी हमारे दरम्यान,
अब एहसास दिलाकर वो भी छीन लिया मुझसे...
मोहब्बत नहीं थी तुमसे, इश्क़ नहीं था तुमसे,
पर जो भी था उसके लिए अल्फ़ाज़ नहीं ह मेरे पास...
एक वक़्त वो भी था, जब तेरे एक एक कसिदे को, अपनी तनख्वाह समझ लेते थे ....